अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा

चौपाई २, दोहा २३० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥ भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥ २ ॥

अर्थ

ऐसा कहकर श्रीरामजी ने फिरकर उस ओर देखा। श्रीसीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा [को निहारने] के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये। सुन्दर नेत्र स्थिर हो गये (टकटकी लग गयी)। मानो सकुचाकर निमि ने [जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़कौ-दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से] पलकें छोड़ दीं, (पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे पलकों का गिरना रुक गया)।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।

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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन