सकुचि सीयँ तब नयन उघारे
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे
चौपाई २, दोहा २३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥ नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥ २ ॥
अर्थ
तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने खड़े देखा। नख से शिखा तक श्रीरामजी की शोभा देखकर और फिर पिता के प्रण को याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।
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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन