सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई
सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई
चौपाई ४, दोहा १२१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥ ४ ॥
अर्थ
उनके सौन्दर्य को सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँ तक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्म का परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम