प्रभु पद रेख बीच बिच सीता
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता
चौपाई ३, दोहा १२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥ ३ ॥
अर्थ
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के [जमीनपर अड्डित होनेवाले दोनों] चरणचिह्नों के बीच-बीच में पैर रखती हुई सीताजी [कहीं भगवान् के चरणचिह्नों पर पैर न टिक जाय इस बात से] डरती हुई मार्ग में चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [मर्यादा की रक्षाके लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनों के चरणचिह्नों को बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम