जहँ लगि बेद कही बिधि करनी

चौपाई २, दोहा १२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥ २ ॥

अर्थ

हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहाँ तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहाँ तक चौदहों लोकों में ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [कहीं भी नहीं हैं, इसी से सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग हैं और अपनी महिमा से ही आप निर्मित हुए हैं]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम