एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक

दोहा ११२ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥ ११२ ॥

अर्थ

इस प्रकार वे यात्री प्रेम वश पुलकित शरीर हो और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का दोहा ११२ है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम