करि केहरि बन जाइ न जोई

चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥ ४ ॥

अर्थ

हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँ तक जाएँगे वहाँ तक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम