अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि
दोहा ११७ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥ ११७ ॥
अर्थ
वे अत्यन्त प्रेम से सीताजी के पैरों पड़कर बहुत प्रकार से आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जब तक शेषजी के सिर पर पृथ्वी रहे, तब तक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का दोहा ११७ है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम