पारबती सम पतिप्रिय होहू
पारबती सम पतिप्रिय होहू
चौपाई १, दोहा ११८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥ १ ॥
अर्थ
और पार्वतीजी के समान अपने पति की प्यारी होओ। हे देवि! हम पर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि आप फिर इसी रास्ते लौटें।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम