तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी
चौपाई २, दोहा ११७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी॥ सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥ २ ॥
अर्थ
उत्तम (गौर) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [संकोचवश] पृथ्वी की ओर देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं (अर्थात् न बताने में ग्राम की स्त्रियों को दुःख होने का संकोच है और बताने में लज्जारूप संकोच)। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्रों वाली और कोकिल की-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेम सहित मधुर वचन बोलीं--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम