जानी श्रमित सीय मन माहीं
जानी श्रमित सीय मन माहीं
चौपाई २, दोहा ११५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥ २ ॥
अर्थ
मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़ी छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्रों और मनों को लुभा लिया है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम