एक देखि बट छाँह भलि डासि
एक देखि बट छाँह भलि डासि
दोहा ११४ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥ ११४ ॥
अर्थ
कोई बड़ी सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षण भर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइये, चाहे प्रातःकाल।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का दोहा ११४ है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम