एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय

दोहा १२० · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥ १२० ॥

अर्थ

इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम मार्ग में कैसे चलेंगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का दोहा १२० है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम