दामिनि बरन लखन सुठि नीके

चौपाई ४, दोहा ११५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥ मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥ ४ ॥

अर्थ

बिजली के-से रंग के लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिख तक सुन्दर हैं और मन को बहुत भाते हैं। मुनियों के पट (बल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कसे हुए हैं। कमल के समान हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम