नारि सनेह बिकल बस होहीं
नारि सनेह बिकल बस होहीं
चौपाई १, दोहा १२१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥ १ ॥
अर्थ
स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्या के समय चकईं [भावी वियोग की पीड़ा से] सोह रही हों (दुखी हो रही हों)। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम