स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी
चौपाई ४, दोहा ११६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥ राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥ ४ ॥
अर्थ
हे स्वामिनि! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय (परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी है (अर्थात् मरकतमणि में और स्वर्ण में जो हरित और स्वर्णवर्णनीय आभा है वह इनकी हरिताभ-नील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम