थके नारि नर प्रेम पिआसे
थके नारि नर प्रेम पिआसे
चौपाई २, दोहा ११६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥ २ ॥
अर्थ
प्रेम के प्यासे [वे गाँवों के] स्त्री-पुरुष [इनके सौन्दर्य-माधुर्य की छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं] ! गाँवों की स्त्रियाँ सीताजी के पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेह के कारण पूछते सकुचाती हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम