आगें रामु लखनु बने पाछें
आगें रामु लखनु बने पाछें
चौपाई १, दोहा १२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥ १ ॥
अर्थ
आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियों के वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच में माया!
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम