बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई

चौपाई २, दोहा १२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥ २ ॥

अर्थ

फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूँ--मानो वसन्त-ऋतु और कामदेव के बीच में रति (कामदेव की स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमा के पुत्र) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी (चन्द्रमा की स्त्री) सोह रही हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम