एक कलस भरि आनहिं पानी
एक कलस भरि आनहिं पानी
चौपाई १, दोहा ११५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥ १ ॥
अर्थ
कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं—नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने—।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम