कोटि मनोज लजावनिहारे
कोटि मनोज लजावनिहारे
चौपाई १, दोहा ११७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥ सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥ १ ॥
अर्थ
हे सुमुखि! कहो तो, अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम