सहज सुभाय सुभग तन गोरे

चौपाई ३, दोहा ११७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥ बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥ ३ ॥

अर्थ

ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजी ने [लज्जावश] अपने चन्द्रमुख को आँचल से ढककर और प्रियतम (श्रीरामजी) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम