बार बार सब लागहिं पाएँ

चौपाई ३, दोहा ११६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥ ३ ॥

अर्थ

बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं—हे राजकुमारी! हम विनती करती हैं (कुछ निवेदन करना चाहती हैं), परन्तु स्त्री-स्वभाव के कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।

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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम