तब रघुबीर श्रमित सिय जानी
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी
चौपाई २, दोहा १२४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥ २ ॥
अर्थ
तब श्रीरामचन्द्रजी ने सीताजी को श्रमित जानकर और निकट ही बटु तथा शीतल पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [रातभर वहाँ रहकर] प्रातःकाल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में यमुना-प्रणाम और मार्ग में वनवासियों व ग्रामवासियों के प्रेममय दर्शन का वर्णन है।
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यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम