बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं

छन्द, दोहा २०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

छन्द पाठ

बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥

अर्थ

प्रतिकूल विधाता की करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयी को बावरी बना दिया। उस रात फिर-फिर प्रभु आदरपूर्वक आपकी सराहना करते थे। तुलसीदास कहते हैं—[निषादराज कहते हैं—] श्रीरामचन्द्रजी के समान प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाम मंगल होगा, यह जानकर अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का छन्द, दोहा २०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन