परदखिना करि करहिं प्रनामा

चौपाई २, दोहा २०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥ भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं। बाम बिधातहि दूषन देहीं॥ २ ॥

अर्थ

वे उस स्थान की परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयी को बहुत दोष देते हैं। नेत्रों में जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाता को दूषण देते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन