भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू

चौपाई ४, दोहा १९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥ जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी ने कहा-हे सुरसरि! आपकी रज सबको सुख देने वाली तथा सेवक के लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन