करमनास जलु सुरसरि परई

चौपाई ४, दोहा १९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥ उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥ ४ ॥

अर्थ

कर्मनाशा नदी का जल गंगाजी में पड़ जाता है (मिल जाता है), तब कहिये, उसे कौन सिर पर धारण नहीं करता? जगत्‌ जानता है कि उलटा नाम जपते-जपते वाल्मीकि जी ब्रह्म के समान हो गये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन