एक सराहहिं भरत सनेहू
एक सराहहिं भरत सनेहू
चौपाई ३, दोहा २०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥ ३ ॥
अर्थ
कोई भरतजी के स्नेह की सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजा ने अपना प्रेम खूब निभाया। सब अपनी निन्दा करके निषाद की प्रशंसा करते हैं। उस समय के विमोह और विषाद को कौन कह सकता है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन