मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी
चौपाई ३, दोहा २०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥ कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥ ३ ॥
अर्थ
मैं पापों के समुद्र और अभागी को धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाता ने मुझे कुल का कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाता ने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन