श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना
चौपाई ३, दोहा १९९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥ पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥ ३ ॥
अर्थ
ये स्वर्ण के कण या तारे भी सीताजी के विरह से ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [रामवियोग में] अयोध्या के नर-नारी विलीन (शोक के कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठी में हैं, उन जनकजी को मैं किसकी उपमा दूँ?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन