लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा

चौपाई २, दोहा १९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥ तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥ २ ॥

अर्थ

जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से आँकवार भरकर (हृदय से चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी [आनन्द और प्रेमवश] शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन