बैरिउ राम बड़ाई करहीं
बैरिउ राम बड़ाई करहीं
चौपाई ४, दोहा २०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥ सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥ ४ ॥
अर्थ
शत्रु भी श्रीरामजी की बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलने के ढंग और विनय से वे मन को हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और करोड़ों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूहों की गिनती नहीं कर सकते।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन