करहिं प्रनाम नगर नर नारी

चौपाई ३, दोहा १९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥ करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥ ३ ॥

अर्थ

नगर के नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गंगा जी के ब्रह्मरूप जल को देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गंगा जी में स्नान कर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो (अर्थात् बहुत अधिक हो)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन