चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी
चौपाई २, दोहा १९८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥ भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥ २ ॥
अर्थ
चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजी ने सब माताओं का सत्कार किया। फिर भाई शत्रुघ्न को माताओं की सेवा सौंपकर आपने निषाद को बुला लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन