अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन
सोरठा २०१ · अयोध्याकाण्ड
सोरठा पाठ
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥ २०१ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपा के धाम हैं, यह विचारकर और मन में दृढ़ता लाकर चलिए और विश्राम कीजिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का सोरठा २०१ है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-निषाद मिलन