कुसल मूल पद पंकज पेखी
कुसल मूल पद पंकज पेखी
चौपाई ४, दोहा १९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥ अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥ ४ ॥
अर्थ
हे प्रभो! कुशल के मूल आपके चरणकमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रह से करोड़ों कुलों (पीढ़ियों) सहित मेरा मंगल (कल्याण) हो गया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन