सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा
चौपाई ३, दोहा १९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥ धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥ ३ ॥
अर्थ
उसके मन में संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजी को देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजी के चरणों की वन्दना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन