मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ

चौपाई २, दोहा २०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥ २ ॥

अर्थ

जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीर में कभी हवा भी नहीं लगी, वे वन में सब प्रकार की विपत्तियाँ सह रहे हैं। [हाय!] इस मेरी छाती ने [कठोरता में] करोड़ों वज्रों का भी निरादर कर दिया [नहीं तो यह कभी की फट गयी होती]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-निषाद मिलन