राम राम कहि जे जमुहाहीं
राम राम कहि जे जमुहाहीं
चौपाई ३, दोहा १९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ
जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं (अर्थात् आलस्य से भी जिनके मुँह से रामनाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत् को पवित्र करनेवाला) बना दिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन