कपटी कायर कुमति कुजाती
कपटी कायर कुमति कुजाती
चौपाई १, दोहा १९६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥ राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥ १ ॥
अर्थ
मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूँ। पर जब से श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं भुवन भूषण हो गया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन