कुस साँथरी निहारि सुहाई
कुस साँथरी निहारि सुहाई
चौपाई १, दोहा १९९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥ चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥ १ ॥
अर्थ
कुशों की सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी के चरण-चिह्नों की रज आँखों में लगायी। [उस समय के] प्रेम की अधिकता कहते नहीं बनती।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।
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भरत-निषाद मिलन