देखि दूरि तें कहि निज नामू

चौपाई ३, दोहा १९३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥ ३ ॥

अर्थ

निषादराज ने मुनिराज वसिष्ठजी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर ही से दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजी को समझाकर कहा [कि यह श्रीरामजी का मित्र है]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन