लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ

चौपाई १, दोहा १९३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥ अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥ १ ॥

अर्थ

उनके सुन्दर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूँगा। बैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-निषाद मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत और निषादराज के भावपूर्ण मिलन-संवाद तथा नगरवासियों की भक्ति का वर्णन है।

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भरत-निषाद मिलन