बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा
चौपाई १, दोहा २६१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥ यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥ १ ॥
अर्थ
परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने [मेरे और स्वामी के बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद