नृप बूझे बुध सचिव समाजू

चौपाई ३, दोहा २७१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥ ३ ॥

अर्थ

राजा ने विद्वानों और मन्त्रियों के समाज से पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्या की दशा समझकर और दोनों प्रकार से असमंजस जानकर “चलिये या रहिये?” किसी ने कुछ नहीं कहा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद