आन उपाउ न देखिअ देवा

चौपाई ४, दोहा २६५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥ हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥ ४ ॥

अर्थ

हे देवताओं! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने सुसेवकों की सेवा को मानते हैं। अतएव अपने गुण और शील से श्रीरामजी को वश में करने वाले भरतजी को सब लोग अपने-अपने हृदय में प्रेम सहित स्मरण करो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद