लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू

चौपाई १, दोहा २६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥ १ ॥

अर्थ

गुरु और स्वामी का सब प्रकार से स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मन में कुछ भी संदेह नहीं रहा। हे करुणाकर! अब वही कीजिए, जिससे जन-हित में प्रभु के चित्त में क्षोभ न हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद