अपडर डरेउँ न सोच समूलें
अपडर डरेउँ न सोच समूलें
चौपाई २, दोहा २६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥ मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥ २ ॥
अर्थ
मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। मेरे सोच की जड़ ही न थी। दिशा भूल जाने पर हे देव! सूर्य का दोष नहीं है। मेरा अभाग्य, माता की कुटिलता, विधि की विषम गति और काल की कठिनाई।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद