सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू

चौपाई ३, दोहा २६६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥ ३ ॥

अर्थ

देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओं की सम्मति और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजी को संकोच हुआ। भरतजी ने अपने मन में सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदय में करोड़ों प्रकार के अनुमान करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद